कैराना। जहां एक ओर दशहरे पर बुराई के प्रतीक रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है, वहीं कैराना में इन पुतलों को आकार देने वाले हाथ आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की खूबसूरत तस्वीर पेश करते हैं। यहां मुस्लिम समुदाय का एक परिवार पिछले 35 वर्षों से रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशालकाय पुतले तैयार कर सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। पीढ़ियों से चली आ रही यह कारीगरी न केवल परिवार की रोजी-रोटी का जरिया है, बल्कि कैराना की साझा संस्कृति की पहचान भी बन गई है।

कैराना में दशहरा पर्व के लिए रावण के पुतले तैयार करने की जिम्मेदारी पिछले करीब साढ़े तीन दशकों से मुस्लिम कारीगरों का परिवार निभाता आ रहा है। उस्मान और आलम अपने परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर करीब 20 दिनों की कड़ी मेहनत से 40 फीट ऊंचे रावण तथा लगभग 35-35 फीट ऊंचे मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों को तैयार करते हैं।

बांस की खपच्चियों से तैयार होता है विशालकाय रावण
इन विशालकाय पुतलों को तैयार करने में बांस, कपड़ा, कागज और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले बांस की सहायता से पुतलों का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद कपड़े और कागज की मदद से उन्हें आकर्षक स्वरूप दिया जाता है। करीब 20 दिनों तक परिवार के सदस्य मिलकर तीनों पुतलों को अंतिम रूप देते हैं। पुतलों के निर्माण में लगने वाली मेहनत और कारीगरों की मजदूरी का खर्च श्री रामलीला कमेटी द्वारा वहन किया जाता है।
देवी मंदिर तालाब के किनारे खड़े किए जाते हैं पुतले
पुतले तैयार होने के बाद उन्हें देवी मंदिर तालाब के किनारे निर्धारित स्थान पर खड़ा किया जाता है। विशालकाय पुतलों को सुरक्षित ढंग से खड़ा रखने के लिए रस्सियों और लकड़ी के खूंटों का सहारा लिया जाता है। इसके बाद दशहरा पर्व पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है।

मजहब अलग, मगर 35 वर्षों से कायम है हुनर का रिश्ता
कैराना की इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि जिस रामलीला के लिए मुस्लिम परिवार पूरी मेहनत और लगन से पुतले तैयार करता है, उसका आयोजन हिंदू समाज की धार्मिक परंपरा से जुड़ा है। इसके बावजूद पुतलों को आकार देने वाले इन कारीगरों का रिश्ता पिछले 35 वर्षों से लगातार बना हुआ है। उस्मान और आलम का परिवार अपने हुनर से न केवल दशहरा उत्सव की तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कला, मेहनत और आपसी सहयोग की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती।
कैराना में दशहरे पर जब रावण का विशालकाय पुतला आग की लपटों में समाता है, तो उसके पीछे मुस्लिम कारीगरों के परिवार की करीब 20 दिनों की मेहनत भी छिपी होती है। यही वह तस्वीर है, जो बताती है कि त्योहार भले ही किसी एक धर्म की परंपरा से जुड़ा हो, लेकिन उसे यादगार बनाने में साझा संस्कृति और भाईचारे की भी अहम भूमिका होती है।






